She Survived but this did happen – Anonymous

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She mailed and wondered whether we would be open to sharing a page from her diary. 

When we read her piece we wondered if this is not Hillele then what is? At Hillele we want to share stories/incidents that are silenced by families, societies, traditions, nations, religions, castes and patriarchy. Every feeling, every violation, any abuse must be shared, questioned and challenged if you think it’s important for you. 

When we read this piece we found many of our friends and ourselves in it. We are sure many wo/men will identify themselves with the survivor. Some who have been perpetrators of sexual violence may not want to see themselves in this tale of massive violation of a child’s faith. Some may understand what sexual abuse does to a child, reach out, apologise or vow to make amends. Many survivors of CSA may choose to think why such stories should be discussed in broad day light.

Many of you will, however, agree with us that this story must be told as it is. Our survivor friend has chosen to stay anonymous and not name her abuser as well. She doesn’t want anyone’s sympathy. It’s a life event which happened and is now over. But this did happen…and for too long.

As we read this yet again some of us were reminded of Maya Angelou’s words –

Did you want to see me broken?  
Bowed head and lowered eyes?  
Shoulders falling down like teardrops,  
Weakened by my soulful cries?
Does my haughtiness offend you?  
Don’t you take it awful hard
’Cause I laugh like I’ve got gold mines
Diggin’ in my own backyard.
You may shoot me with your words,  
You may cut me with your eyes,
You may kill me with your hatefulness,
 
But still, like air, I’ll Rise!

 

Rukmini Sen

 

January 2002

मुझे इस महीने के मासिक धर्म नहीं हुए हैं, लगबघ दस दिन ऊपर हो गए और कुछ समझ नहीं आ रहा है, अपनी थोड़ी बहुत जानकारी के हिसाब से बस इतना पता है के मासिक धर्म रुकने का मतलब है मुझे गर्भ ठहर गया होगा, अब माँ से बात करने के अलावा मेरे पास कोई रास्ता नहीं बचा है, लेकिन उन्हें बताउंगी क्या, इतने समय से भी तो कुछ नहीं बता सकी..लेकिन अगर ऐसा हो गया है तो अब मैं क्या करुँगी…क्या ऐसा कोई रास्ता नहीं है के मैं माँ को न बताऊँ और ये ठीक हो जाए…मैं क्या माँ बनने वाली हूँ??

शाम होते होते ये निर्णय ले चुकी थी कि मम्मी को सब कुछ बताना पड़ेगा, ज़्यादा से ज़्यादा किसी के साथ न देने की स्थिति में मुझे आत्महत्या करनी होगी क्यूंकि अभी तो मैं इतनी बड़ी भी नहीं हुई के अपना खर्च निकाल सकूं, डरते डरते जब माँ को ये बताया कि मुझे मासिक धर्म नहीं हुआ है तो माँ ने कहा कभी कभी देर में हो जाता है, मगर जब मैं तब भी संतुष्ट नहीं हुई तो उन्होंने मुझसे पूछा के हुआ क्या है, तब मैं पहली बार उन्हें बता सकी कि मेरे साथ पिछले नौ साल से माँ के एक मुंहबोले भाई का बेटा कुछ ऐसा करता है जिससे मैं गर्भवती हो सकती हूँ, माँ पहले तो मेरी बात सुन कर सन्न रह गयीं लेकिन फिर उन्हें लगा के इतने छोटे बच्चे को क्या मालूम कि ये सब क्या होता है..

हाँ ये सच है के जब मैं पांच साल की थी और पहली बार उसने मेरे साथ ये किया तब मुझे नहीं मालूम था कि ये क्या होता है लेकिन तेरह बरस की होते होते मैं समझ चुकी थी कि वो मेरा शोषण कर रहा है…उस दौरान जब वो मेरे निजी अंगों को छूता था और अपने लिंग पर सरसों का तेल लगा कर मेरी योनि से सटा देता था मैं डर और असहनीय दर्द से बिलबिला उठती थी…और हर बार जब भी ये करता था तो मुझसे कहता था के वो मुझसे बहुत प्रेम करता है और शादी करना चाहता है, मुझसे उसकी ये सब बातें समझ नहीं आती थी और हर बार उसका विरोध करने के ऐवज में सिगरेट से दागना और जान से मार देने की धमकी ने मेरे होठों को सिला हुआ था….वो जानबूझ कर ऐसी जगह जलाता था जहाँ कोई देख न सके, मेरे नितम्भों और योनि के आस पास आज भी ऐसे कई निशान मौजूद हैं…

जब मैंने माँ को ये सब बताया तो वो रोने लगीं और चिंतित भी हो गयीं के क्या सचमुच मुझे गर्भ ठहर चूका था….उन्होंने मुझसे जल्दी से पुछा आखिरी बार उसने कब तुम्हारे साथ ऐसा किया था, मैंने कहा के दो महीने पहले और उसके बाद वो अपने दादा दादी के घर चला गया था…तब माँ को इतनी राहत मिली कि ये गर्भ का मामला नहीं हैं, और चूँकि मैं इस सबसे इतना डरी हुई हूँ इसलिए मासिक धर्म कि तारीख निकल जाने को मैं वो सब समझ बैठी…अब माँ के लिए बेहद ज़रूरी हो गया था मेरा वो डर निकलना और साथ ही साथ इतने सालों तक मेरे साथ जो हुआ उसके लिए कुछ ऐसा करना कि मैं इस सबसे उबर पाऊं….

April 2002 आज दोपहर में खाने के वक़्त अचानक मम्मी बाहर से दौड़ती हुई आयीं और बोलीं मनोज ने आत्महत्या कर ली है, मैंने पूछा क्यूँ, वो बोलीं इसका तो किसी को नहीं पता बस मामा मामी गाँव जा रहे हैं उसके अंतिम संस्कार के लिए, मेरी कोई प्रतिक्रिया न होती देख वो शायद भांप चुकी थीं के कुछ गड़बड़ हो गयी है…और उसके बाद हम दोनों के बीच इस बारे में दोबारा कभी कोई बात नहीं हुई…

मगर मेरे अन्दर ही अन्दर हज़ारों लाखों बातें चल रहीं थी, एक तरफ अपनी कही वो बात सच होने के ख़ुशी थी के आखिरकार वो मर ही गया, इन नौ सालों में एक यही चीज़ तो थी जो मुझे किसी भी चीज़ से कहीं ज़्यादा चाहिए थी..मेरा बस चलता तो मैं खुद उसका खून कर देती लेकिन इतनी हिम्मत  नहीं थी..…मगर साथ ही साथ एक सवाल ऐसा था जो मैं उससे हमेशा पूछना चाहती थी के उसने मेरे साथ ऐसा किया क्यूँ, मैं न तो उससे प्रेम करती थी और न ही किसी भी तरह से उसके प्रति आकर्षित थी, वो कहता था उसे मुझसे प्रेम है लेकिन आप जिससे प्रेम करते हैं उसके शरीर की ऐसी दुर्दशा तो नहीं करते हैं…सिर्फ इसलिए के मेरी माँ और मैं अकेले रहते थे, और उसके परिवार का हमारे यहाँ आने जाने ने उसको मेरे शरीर पर वो सब अधिकार दे दिए जो सिर्फ मेरे लिए हैं…

घर में माँ के अलावा ये सब कोई नहीं जानता, और शायद इसलिए उनको मेरे रोने से कोई फर्क नहीं पड़ता…बड़े लोग बोलते हैं के हमारे कष्ट हमारी पिछले जन्म के पापों की सजा होते हैं, अक्सर खाली बैठी बैठी यही गिनती हूँ के कितने पापों की सज़ा भुगत चुकी हूँ, हिसाब किताब में कोई कमी न रहने पाए…

 

By Anonymous

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