Feminist Diary (2) – Manisha Pandey

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लड़कियों !
जरा सोचो। वो कौन हैं, जिन्‍हें तुम्‍हारे बोलने से डर लगता है। जब-जब तुम्‍हारी आंखें हिम्‍मत और साहस से चमकती हैं, वो अपने बिलों में कुलबुलाने लगते हैं। तुम्‍हारे मुंह खोलते ही रुक जाती है उनकी सांस कि कहीं तुम उन्‍हीं की हकीकत न बक दो। तुम्‍हारे मुंहफट होने और किसी की भी परवाह न करने से उनकी जान जलती है। वो अपनी दोनों मुट्ठियां भींचे अपने विशालकाय कमरों के इस कोने से उस कोने में चहलकदमी करते हैं और योजनाएं बनाते हैं कि कैसे तुम्‍हारी जबान काट ली जाए। वे तुम्‍हारे बोलने से खतरा महसूस करते हैं।
शिनाख्‍त करो, उन सबकी। आखिर वो कौन लोग हैं? कहीं वे वही तो नहीं, जिन्‍होंने कुछ लोगों के वेद पढ़ने पर उनकी आंखें नोच लेने के फरमान जारी किए थे। कहीं ये वही तो नहीं, जिन्‍होंने कुछ लोगों के वेद सुन लेने पर उनके कानों में शीशा पिघला देने का आदेश सुनाया था। कहीं ये वही तो नहीं, जिन्‍होंने संस्‍कृत नाटकों में पुरुषों के मुंह से देववाणी संस्‍कृत बुलवाई और नौकर-चाकर-गुलामों और औरतों के मुंह से हीन प्राकृत। जिन्‍होंने सारे धर्मग्रंथ, वेद और महान पुस्‍तकों की रचना संस्‍कृत में की। वो संस्‍कृत जिन्‍हें औरतों और शूद्रों को पढ़ने की मनाही थी क्‍योंकि वो देवभाषा थी और औरतें म्‍लेच्‍छ, निकृष्‍ट गुलाम।
कौन कहता है दुनिया बदल गई है। संस्‍कृत क्‍या, तुम तो अब अंग्रेजी भी बोलती हो। लेकिन इससे इस मुगालते में न रहना कि गुलामी की सब बेडि़यां कट गईं। अब दुनिया बराबर है। हर ओर न्‍याय है। वो तुम्‍हें पढ़ने और बोलने की आजादी दे रहे हैं, लेकिन बस उतनी ही, जिससे उनकी सत्‍ता को खतरा न हो। वे तुम्‍हें उतना ही आजाद देखना चाहते हैं, जिससे उनकी जिंदगी सुभीते से चलती रहे। और उनके बिस्‍तर पर जवां शरीरों का कभी टोटा न होने पाए। दिमाग तुम्‍हारा मुक्‍त हो, न हो, देह के बंधन से तुम जरूर मुक्‍त हो जाओ।
लड़कियों ! उन सबकी शिनाख्‍त करो। उनके तरीके बदल गए हैं। लेकिन वो फिर आएंगे तुम्‍हारे कानों में शीशा पिघलाने। अपने हथियार तैयार रखना। इस बार उनका शीशा उनके ही कानों मे उड़ेल देना।

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With all due respect for Mr. Rahul Dev ji –
मैं स्‍कूल की दसवीं कक्षा का “हिंदी हमारी मातृभाषा है” पर कोई ललित निबंध नहीं लिख रही हूं। मैं जीवन और समाज से जुड़ी कुछ ठोस सच्‍चाइयों की बात कर रही हूं।
मैं सहज हिंदी-सरल हिंदी, क्लिष्‍ट हिंदी-विरल हिंदी की भी बात नहीं कर रही हूं। मैं किसी हिस्‍टॉरिकल डिस्‍कोर्स में नहीं जाऊंगी। फेसबुक उसकी जगह नहीं है और न इतना वक्‍त है मेरे पास।
मैं तो अपनी, इसकी, उसकी और सबकी जिंदगी से जुड़े कुछ ठोस सवाल पूछ रही हूं। जवाब दें –
1- हमारे शहरों के अंग्रेजी स्‍कूलों की फीस 5000 है और हिंदी स्‍कूलों की फीस 5 रुपया। क्‍यों?
2- इंग्लिश मीडियम में पढ़ने वाले सारे अपर क्‍लास, कारों से आने वाले बच्‍चे हैं और हिंदी मीडियम में पढ़ने वाले मुहल्‍ले की पान की दुकान पर घूमने वाले लड़के या कम उम्र में ही दुपट्टा डालने वाली डरी, सहमी, चुप्‍पी लड़कियां हैं। क्‍यों ?
3- सेंट फ्रांसिस के बच्‍चे जितने कॉन्फिडेंट होते हैं, उनका दुनिया का जितना एक्‍सपोजर होता है क्‍योंकि वो अमीर बाप के बेटे हैं, सरकारी हिंदी मीडियम के बच्‍चे उतने ही दब्‍बू और डरे हुए होते हैं। क्‍यों?
4- अब स्‍कूलों को मारिए गोली। चलिए महान मुल्‍क के महान पत्रकारिता स्‍कूलों की सैर करते हैं। अगर अभी तक आपने शोध नहीं किया है तो अब कर लें और फिर मुझे बताएं कि हिंदी पत्रकारिता स्‍कूलों में पढ़ने वाले 99.9 बच्‍चे हिंदी प्रदेशों के निम्‍न मध्‍यमवर्गीय परिवारों के होते हैं। वो अमीर घरों के लड़के नहीं होते। क्‍यों?
5- देश के श्रेष्‍ठतम पत्रकारिता स्‍कूलों के इंग्लिश मीडियम से पढ़कर निकले लड़के-लड़कियां 20,000 रु. में पहली नौकरी की शुरुआत करते हैं और हिंदी के लड़के-लड़कियां पांच हजार रु में। क्‍यों?
6- जिंदगी भर उनके इंक्रीमेंट भी उसी दर से होते हैं। वो लड़ नहीं बातें, काबिल हों तो भी आत्‍मविश्‍वास से अपनी बात नहीं कह पाते। उनकी जिंदगी में इकोनॉमिक सिक्‍योरिटी नहीं है। उन्‍हें यकीन नहीं कि अगर बॉस ने उनके सेल्‍फ रिस्‍पेक्‍ट के साथ ज्‍यादा मेस किया तो वो कोई फैलोशिप लेकर हार्वर्ड चले जाएंगे। उनके पास विकल्‍पों के एक हजार दरवाजे खुले हैं। वो तो इतने डरे हुए होते हैं कि उनके लिए इतना ही काफी है कि बस नौकरी बची रहे, बनी रहे। क्‍यों?
6- टाइम्‍स ऑफ इंडिया में काम करने वाली लड़कियां ऑक्‍सफोर्ड और कैंब्रिज से डिग्री लेकर लौटी हैं और दैनिक जागरण में काम करने वाली लड़कियां मऊ, आजमगढ़, इलाहाबाद, आरा-छपरा के आर्यकन्‍या इंटर कॉलेज से। क्‍यों?
7- अगर आपको लगता है कि हिंदी या इंग्लिश में पढ़ना दरअसल आपके इकोनॉमिक क्‍लास और सोशल स्‍टेटस का मसला नहीं है तो आप या तो बड़े भोले हैं या फिर बड़े ही शातिर। क्‍यों?

8- और आखिर सबके बच्‍चे हिंदी पत्रकारों के, हिंदी लेखकों के, हिंदी अधिकारियों के, हिंदी के एक्‍स वाई जेड के बच्‍चे इंग्लिश मीडियम में ही पढ़ रहे हैं। क्‍यों?
9- वो सब के सब अंग्रेजी की नौकरी करेंगे। अंग्रेजी के जरिए अपना क्‍लास चेंज करेंगे। क्‍यों?

With All due respect Sir, हिंदी या अंग्रेजी जानना या बोलना, या पढ़ना, या लिखना या उसमें नौकरी करना आपकी भावना का, आपके भाषाई प्रेम और चयन का सवाल नहीं है। ये क्‍लास का सवाल है। और अब आप प्‍लीज ये मत कहिएगा कि क्‍लास भी exist नहीं करता है। कि क्‍लास के बीच कोई पावर इक्‍वेशन भी exist नहीं करता

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अगर मैंने तय किया होता कि मैं सिर्फ अपने घर की कहानी लिखूंगी, अपने मां-पापा की कहानी तो फिर बात ही क्‍या थी। मेरी वॉल सिर्फ गुडी-गुडी चीजों से भरी होती। प्‍यारा घर, प्रेम भरे रिश्‍ते, अद्भुत लोकतांत्रिक संबंध। अगर इतने ही ध्‍यान से आप मेरी वॉल पढ़ रहे हैं तो जरूर वो सारी पोस्‍ट भी पढ़ी होंगी जो मैंने अपने पापा के लिए लिखी हैं। मेरे पापा तो आज भी घर का सारा काम करते हैं, इस उम्र में मेरे कपड़े तक धो देते हैं, मेरे घर आते हैं तो मेरे लिए ऑफिस से लौटने से पहले खाना बनाकर रखते हैं। मैं लाख मना करूं, लेकिन दिन भर मेरे घर की एक-एक चीज की सफाई करते रहते हैं। मेरी किताबों की डस्टिंग करते हैं। अपनी बेटी से कभी ये नहीं कहते कि “शादी कर लो। दुनिया सवाल करती है। मेरी नाक कट रही है।” जाति, धर्म, लिंग नस्‍ल, राष्‍ट्रीयता किसी चीज का बंधन नहीं मानते। कल को मैं कोई नाईजीरियाई लड़का लाकर खड़ा कर दूं उनके सामने कि मुझे इससे शादी करनी है तो खुशी-खुशी कहेंगे, “I love and respect your decision my darling.” लेकिन सबसे महत्‍वपूर्ण बात ये है कि उन्‍होंने कभी ये नहीं सिखाया कि तुम्‍हारा छोटा सा अंडा, तुम्‍हारा घोंसला, तुम्‍हारा पेड़ ही पूरा संसार है। उनका मानना था कि संसार बहुत बड़ा है और हर इंसान को उस संसार में घूमने, उसे जानने-समझने का हक है। मैं बड़े संसार में घूम पाई, इसलिए देख पाई की दुनिया हमारा घोंसला भर नहीं है। जैसेकि आपको लगता है कि चूंकि आपके मां-पापा के बीच सामंजस्‍य है, इसलिए दुनिया के सारे घर और सारे रिश्‍ते ऐसे ही फूलों से सुंदर होंगे।
और क्‍या बात कर रहे हैं आप? आपके घर में जेंडर डिसबैलेंस नहीं है, तो क्‍या हमारे समाज में भी नहीं है? आप तो अछूत भी नहीं हैं, तो क्‍या दुनिया में जातिवाद और छुआछूत नहीं है? आपके घर में नस्‍लवादी व्‍यवहार भी नहीं होता होगा तो क्‍या दुनिया में नस्‍लवाद नहीं है? आपका घर तो गाजा पट्टी पर भी नहीं है, जहां आए दिन बम गिरते हैं और लोग लोहे के घरों में रहते हैं तो क्‍या दुनिया में बम नहीं गिरते? हो सकता है आपकी बहनें पढ़ने स्‍कूल जाती हों तो क्‍या संसार की सारी लड़कियां जाती हैं? आपकी तो बचपन में शादी नहीं हुई, तो क्‍या बचपन में शादियां हो नहीं जातीं? आपको तो प्रेम करने के लिए कोई जान से नहीं मार डालेगा तो क्‍या ऑनर किलिंग नहीं होती है? आपके मुंह पर तो कोई लड़की प्रणय निवेदन स्‍वीकार न करने पर तेजाब नहीं फेंक देगी तो क्‍या इस देश में लड़कियों के मुंह पर तेजाब नहीं फेंका जाता है? आप तो दहेज के लिए जलाए भी नहीं जाएंगे, तो क्‍या इस देश में लड़कियों को जलाया नहीं जाता है? आपके साथ तो रेप भी नहीं होगा तो क्‍या इस देश में हर दिन, हर क्षण बलात्‍कार नहीं हो रहा है?
संसार दुख, तकलीफों और अन्‍याय से भरा हुआ है। हर जगह, हर स्‍तर पर ये हो रहा है भाईसाहब। संसार सिर्फ आपके मम्‍मा-पापा नहीं हैं। संसार आपका छोटा सा घोंसला नहीं है। संसार बहुत बड़ा है। अपने घोंसले से बाहर आकर देखिए।
और नहीं भी देखना चाहते तो मत देखिए। लेकिन जहां तक मेरा सवाल है, मुझे “बेवकूफ नारीवादी” कहाया जाना स्‍वीकार्य है, लेकिन सिर्फ अपने घोंसले को पूरा संसार समझ लेना नहीं।

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