कमल – Kishore Jha

Kishore
Kishore

मेरा काम कुछ ऐसा है कि अक्सर सफ़र में रहता हूँ और स्टेशन पर आना-जाना लगा रहता है. पर इतने सालों बाद भी स्टेशन से मोहब्बत नहीं हो पाई और वहां हमेशा कुछ बेचैनी सी महसूस होती है. गाड़ी से उतर के घर पहुचने की बेताबी रहती है और स्टेशन से बाहर आकर पहली चुनौती होती है एक ऑटो पकड़ना जो आपको घर तक ले जाने को तैयार हो. ऑटोवालों से जद्दोजहद दिल्ली के बाशिंदों की ज़िन्दगी का एक अहम हिस्सा है. उनसे तोल मोल करना हमारी फितरत में शामिल हो गया है. कई बार मुझे अहसास हुआ है कि ऑटोवाला अगर वाजिब पैसे भी मांग रहा हो तो भी दिल कहता है कि दस पांच रुपये तुड़वा ही लें वरना शायद खाना हजम ना हो! हमेशा दिल में ऑटो वालों से ‘लुटने’ का डर लगा रहता है. दिल्ली के ऑटो वाले लूटने के मामले में पूरे भारत में मशहूर हैं. वह बात दीगर है कि इतनी लूटपाट के बावजूद दिल्ली के दो तिहाई ऑटोवाले सालों की मेहनत के बावजूद खुद का एक ऑटो नहीं खरीद पाते. सबको लूट-लूट कर जो सरमाया उन्होंने खड़ा किया है वह तो जग ज़ाहिर है पर यह लुटने का अहसास पीछा नहीं छोड़ता. स्टेशन पर तो यह जद्दोजहद अपनी चरम सीमा पर होती है. आप स्टेशन की सीढियों से बाद में उतरते हो ऑटो वाले पहले घेर लेते है. ‘कहाँ जायेंगे साहब’ की आवाज़ दायें, बाएं, आगे, पीछे सब तरफ से सुनाई देती हैं. यह बात दीगर है कि इस बात से कोई फरक नहीं पड़ता कि आपको किधर जाना है क्योंकि वह तो वहीं जायेंगे जहाँ उन्हें जाना है. खैर, उस दिन मुझे स्टेशन से सीधा एक मीटिंग में जाना था सो ऑफिस से गाड़ी मुझे लेने आने वाली थी. इसलिए ऑटो वालों की भीड़ को नज़रंदाज़ करते हुए स्टेशन के बाहर आ रहा था. अचानक एक इन्सान से आँखे दो-चार हुईं. चेहरा जाना-पहचाना लगा. अभी मैं ‘कौन है’, ‘कहाँ देखा है’ की कश्मकश में ही था कि उसने गरमजोशी से हाथ बढ़ाया और बोला ‘किशोर भाई कैसे हो?’ मुझे उसे पहचानने में कुछ सेकंड्स जरूर लगे पर पहचान लिया. सालों से हरेक मौसम में ऑटो चलाते-चलाते उसका चेहरा उसकी उम्र से ज्यादा बुजुर्ग लग रहा था. कुछ हिचक के साथ मैंने भी हाथ बढाया. पुराने दोस्त से मिलकर बहुत अच्छा लग रहा था पर न जाने क्यूं, मेरे जवाब में वो गरमजोशी नहीं थी जैसी उसके हाथ बढ़ाने में थी.

वह मेरे बचपन का दोस्त था कमल. सिर्फ दोस्त कहना काफी न होगा, लंगोटिया यार था. मेरे घर के नज़दीक की गली में एक गेराज में रहता था. कपड़े धोना और इस्त्री करना उसके परिवार का पेशा था और वह भी नियमित रूप से परिवार के काम में हाथ बंटाता था. वैसे तो जिस बिल्डिंग में मैं रहता था वहां बहुत से बच्चे थे और बाहर गलियों के बच्चों के साथ खेलने को कुछ अच्छी नज़र से नहीं देखा जाता था पर मुझे बाहर गली में खेलना बहुत पसंद था. हमारे मकान में बहुत बड़ा आँगन था जहाँ बिल्डिंग के सभी बच्चे क्रिकेट से लेकर आँख-मिचोली तक सभी कुछ खेला करते थे पर मुझे वो सब खेल गली के खेलों के मुकाबले कुछ कमतर ही लगते थे. कमल सभी खेलों में अव्वल था. चाहे वो कंचे हों, गुल्ली-डंडा हो या फिर क्रिकेट. उसकी विशेष क़ाबिलियत की वजह से सभी उसको अपनी टीम में रखना चाहते थे. दोस्ती के चलते

मुझे भी वह अपने साथ रख ही लेता था चाहे वह टीम मुझे रखना चाहे या नहीं. शारीरिक डील-डौल में भी मजबूत था. दूसरे बच्चों से जब भी दो-दो हाथ की नौबत आती थी तो वह मेरा ही साथ देता था. ऐसे कई वाकये होंगे जब उसने मुझे पिटने से बचाया होगा. एक बार मोहल्ले के दो बड़े लड़कों के साथ मैं बंगलो रोड के एक बंगले में अमरुद तोड़ने गया था. उन्होंने मुझे बंगले की ऊँची दीवार पर चढ़ा दिया था ताकि मैं उस पर खड़ा होकर अमरुद तोड़ सकूँ और नीचे फेंकता रहूं. पर एक-दो अमरुद तोड़ते ही बंगले से एक आदमी चिल्लाता हुआ निकल आया. आवाज़ सुनते ही वो दोनों लड़के तो रफूचक्कर हो गए. मैं उनकी मदद के बिना उस ऊँची दीवार से नहीं उतर सकता था सो वहीं खडा-खड़ा रोने लगा. आत्मसमर्पण के अलावा कोई चारा ना था. शेर के शिकार के लिए बंधी बकरी की तरह घबराया-सा उस आदमी का इंतज़ार कर रहा था. सबसे ज्यादा खौफ इस बात का था कि वो मेरे घर वालों को बुला कर मेरी काली करतूतों का कच्चा चिटठा बताएगा! बंगले के मालिक के साथ-साथ घर वालों की मार और तानों को भी झेलना पड़ेगा. आखिर बंगले के मालिक ने ही मुझे दीवार से उतारा. नीचे आने के बाद में और जोर-जोर से रोने लगा. चोरी करते हुए पकड़े जाने का क्या परिणाम होगा यह सोच-सोच कर मेरा पूरा शरीर कांप रहा था. खैर, वह इन्सान भला आदमी था और मेरा रोना देख कर उसे रहम आ गया. ‘चोरी करना बुरी बात है’, जैसी एक-दो नसीहतें देकर उसने मुझे छोड़ दिया. इतने बड़े हादसे से पाक साफ़ निकल जाने की बेहद ख़ुशी थी पर दोस्तों द्वारा मुसीबत में छोड़ के चले जाने का मलाल भी था. लौट कर मैंने कमल को सारी कहानी सुनाई. वो दोनों लड़के उम्र में बड़े थे। कमल भी इस धोखे का बदला लेने में सक्षम नहीं था. पर मेरे दुःख को कम करने के लिए वह मुझे फिर से उस बंगले के पास ले जाने लगा. मेरी उस बंगले में जाने की हिम्मत नहीं हुई और मैं 100-200 मीटर पहले ही रुक गया. वह खुद दीवार पर चढ़ा और मेरे लिए अमरुद तोड़ के लाया. हालांकि अमरुद न तोड़ पाना मेरी उदासी का सबब ना था पर उसने अपनी तरफ से मेरा दुःख कम करने कि कोशिश जरूर की थी. ठीक से कहना मुश्लिक है पर ‘शायद मेरी-उसकी दोस्ती छह-सात साल की उम्र से ग्यारह-बारह तक रही होगी. उसके बाद शायद हम दोनों के ही नए दोस्त बन गए थे और हमारी मुलाकातें कम होती चली गयीं. साथ-साथ पक्की दोस्ती का एहसास भी जाता रहा. फिर भी, एक ही मोहल्ले में रहते थे सो कभी-कभार मुलाकात तो हो ही जाती थी.
कुछ साल बाद शायद वे लोग कमला नगर छोड़ कर कहीं और रहने चले गए. शायद जमुना पार. कुछ सालों बाद फिर से मुलाक़ात हुई तो पता चला कि स्कूल के बाद उसने पढ़ाई छोड़ दी थी और गाड़ी चलाना सीख रहा था. समाज में हमारे ओहदे के फासले ने भी दूरियां बढ़ाने में अपनी भूमिका निभाई होगी.

पर जब तक वो दोस्त था दिल के बहुत करीब था. आज भी जब अपना बचपन याद करता हूँ तो उसके साथ बिताये लम्हों के बिना बचपन मुक्कमल सा नहीं लगता. पर जब भी उसे याद करता हूँ तो रिश्तो की गर्माहट के साथ-साथ आत्मग्लानि का एक अहसास भी मुझे कचोट जाता है. उस दिन गाड़ी में बैठ कर जब पुरानी यादें ताज़ा कर रहा था तब भी अहसासे-जुर्म का वो दर्द किसी कांटे की तरह दिल को जख्मी कर गया था. और अब सोचता हूँ तो याद आता है शायद इसी अहसास के कारण आखिरी दिनों में मैं उससे नज़रें चुराने लगा था। हमारे बीच बढ़ी दूरियों में इस अहसास का भी हाथ रहा होगा. बात उन दिनों की है जब संतोषी माता की बहुत मान्यता थी. कहते है कि जब संतोषी मां नाम की फिल्म सिनेमा हाल में चलती थी तो लोग परदे पर पैसे चढ़ाया करते थे. देवी देवताओं की पूजा का चलन भी फैशन की तरह बदलता रहता है. आज कल साईं बाबा का फैशन चल रहा है. लोग दूर-दूर से शिर्डी के साईं बाबा के दर्शन करने जाते है. बुजुर्ग से बुजुर्ग लोग वैष्णो देवी की चढ़ाई ऐसे कर जाते हैं जैसे सुबह की सैर को निकले हों. लोगों के इस अकीदा की नुमाइश अक्सर उनकी गाड़ियों, घरों और दफ्तरों में देखने को मिलती है. साईं बाबा और वैष्णो देवी की भक्ति आजकल जोरों पर है पर बहुत दिनों से यह नहीं सुना कि किसी ने संतोषी माता की पूजा की हो या सोलह शुक्रवारों का व्रत रखा हो. मेरे बचपन में संतोषी माता को खुश करने के लिए सोलह शुक्रवारों के व्रत का बहुत चलन था. हमारे मोहल्ले में शायद ही कोई ऐसा घर रहा होगा जहाँ कुंवारी लड़की ने सोलह शुक्रवारों का व्रत न रखा हो. सोलह शुक्रवारों का व्रत करने के बाद उद्यापन करना होता था और उद्यापन के लिए कम उम्र के ग्यारह या सोलह (ठीक से याद नहीं) लड़कों को खाना खिलाना होता था. हम लोगों की बहुत डिमांड थी. पंडितजी का लड़का होने के कारण मेरी डिमांड तो कुछ ज्यादा ही थी. हर शुक्रवार ‘बुक’ रहता था. मेरी बहन ने भी सोलह शुक्रवारों का व्रत रखा था. व्रत ख़त्म होने के बाद उद्यापन का वक्त आया. ग्यारह या सोलह लड़के पूरा करने के लिए मुझसे गुजारिश की गयी कि मैं भी अपने दोस्तों को न्योता दे कर आऊँ. मैं भी खुश था की दोस्तों को घर बुलाकर मेहमाननवाजी का मौका मिला है. जल्दी-जल्दी दोस्तों को दावतनामा दे आया. शाम को जब घर वालों ने तफ्तीश की कि कितने लड़कों को न्योता दिया है तो मैं नाम गिनाने लगा. उन नामों में एक नाम कमल का भी था.

उसका नाम सुनते ही सबके चेहरे का रंग कुछ बदल गया. मुझे बताया गया कि मैं कमल को इस उद्यापन में नहीं बुला सकता क्योंकि वह जात का धोबी है. ऐसा नहीं है कि उस समय जात-पात को लेकर मेरे कुछ उसूल थे और उस समय मुझे इंसान की बराबरी के सिद्धांत का इल्म भी ना था. बल्कि बचपन से ही जब लोग ‘पंडित जी का लड़का’ कह कर इज्जत बख्शते थे तो गर्व महसूस होता था. ज़िन्दगी के एक बड़े हिस्से में ऊँची जाति का होने के कारण जो विशेषाधिकार मिलते हैं उनका पूरा फायदा उठाया है और आज भी जाने-अनजाने उससे लाभान्वित होता ही रहता हूँ. बहरहाल, कमल को उद्यापन में बुलाना ठीक नहीं है यह बात मेरी समझ से बाहर थी.

मैंने इसका विरोध करने की कोशिश कि तो मुझे डांट-डपट के चुप करा दिया गया. मुझ से साफ़ कहा गया कि उसको आने के लिए मना कर दूं. घर वालों से लड़ने-भिड़ने की ताक़त मुझ में नहीं थी और ना इतनी हिम्मत थी कि कमल को जाकर कह सकूं कि वो मेरे घर आमंत्रित नहीं है. पूरी शाम इसी कश्मकश में बीती कि क्या करूं. उसको जाकर यह कहना हरगिज मुमकिन नहीं था कि कल मत आना मेरे घर. मैं दोस्त के सामने इस शर्मिंदगी का सामना नहीं कर सकता था. पर साथ ही साथ यह बात भी मुझे खाये जा रही थी कि कल अगर वह आया और मेरे घर वालों ने उसे और लड़कों के साथ बैठने नहीं दिया या कोई बदसलूकी की तो मैं क्या करूंगा. कुछ लोगों को लग सकता है कि क्या बच्चे इन सब बातों पर इतना सोच सकते हैं? पर मैं आपको बता सकता हूँ कि उस दिन मैं उम्मीद कर रहा था कि कोई जादू से मुझे गायब कर दे ताकि मुझे आने वाली सुबह का सामना ना करना पड़े. उस शाम का वह अहसास आज भी दिल के किसी कोने में जिंदा है। मैं आज भी उसे महसूस कर सकता हूँ. उस दिन जब उसे स्टेशन पर देखा तो शायद इसी अहसास के कारण उसे पहचानने में देरी हुई या शायद दिल का कोई कोना उसे पहचानने से कतरा रहा था. शायद इस कारण मैं उससे उस गरमजोशी से ना मिल सका जिस गर्माहट के साथ उसने हाथ बढ़ाया था. खैर, पहले उद्यापन का किस्सा। तो वो वो पूरी शाम इसी कशमकश में गुजरी और रात को सोने से पहले भी लगातार यही सोचता रहा कि कल सुबह क्या होगा. बार-बार एक ही खयाल दिल में आ रहा था कि किसी तरह आने वाली सुबह टल जाये पर सुबह तो आनी ही थी सो आ गयी. सुबह से ही उद्यापन की तैयारियां चल रही थी और मैं आने वाली स्थिति से निपटने की योजना बना रहा था. मैंने सोच लिया था कि मैं दरवाजे पर नज़र रखूंगा और जैसे ही कमल आएगा उसे कोई बहाना बना कर बाहर से ही कहीं ले जाऊँगा. कहाँ ले जाकर क्या करूंगा यह मालूम नहीं था पर यह मैंने तय कर लिया था कि घर में उसका अपमान नहीं होने दूंगा. एक-एक करके कुछ दोस्त और कुछ अन्य लड़के आने शुरू हुए. गिनती पूरी हुई तो उद्यापन कि औपचारिकतायें भी शरू हुईं. कमल अब तक नहीं आया था। मेरी एक आंख दरवाजे पर ही लगी थी. थोड़ी देर में खाना-पीना ख़त्म हुआ और लड़के वापस चले गए. मुझे थोड़ा सुकून मिला कि कमल के न आने से मैं शर्मिंदा होने से बच गया. सोचा कि किसी काम में फंस गया होगा इसलिए नहीं आ पाया. काफी सालों बाद समझ में आया कि उसका ना आना कोई इतेफाक नहीं था….कि वह व्यस्तता के कारण नहीं बल्कि जानबूझ के नहीं आया था. भले ही मुझे मालूम नहीं था कि धोबी जाति के बच्चे ब्राहमणों के घर उद्यापन में नहीं बुलाये जाते पर उसको यह अहसास रहा होगा कि उसे ऐसे मौकों पर नहीं जाना चाहिए. या फिर उसके घर वालों ने मौके की नज़ाकत को समझते हुए उसे रोक लिया होगा. उसके ना आने से मैं उस समय तो शर्मिंदगी से बच गया था पर जिंदगी भर के लिए एक पछतावे और शर्मिंदगी का एहसास मेरे साथ जुड़ गया था.

दफ्तर की गाड़ी में बैठते ही ये सारी यादें एक-एक कर के मेरे ज़हन से गुजरने लगीं और अफ़सोस हुआ कि उससे कुछ और समय बातचीत क्यों न हो सकी. मीटिंग की जल्दी और इंतजार करती गाड़ी के अहसास ने उससे ज्यादा बातचीत का मौका ही नहीं दिया था. बस औपचारिकता भरी दो-चार बातें ही तो हो पाई थीं. उसका पेशा क्या था ये बात तो उसकी पोशाक से ज़ाहिर थी। मैंने भी संक्षेप में उसे बताया था कि मैं नौकरी करता हूँ. उसको एक बात की बड़ी हैरानी हुई थी कि मैंने अभी तक शादी नहीं की है. उसकी शादी को सत्रह बरस हो चुके थे और उसके बच्चे स्कूल में पढ़ते थे. चलते-चलते उसने भी वो सलाह दे ही डाली थी जो मुझे अक्सर मुफ्त में मिलती रहती है, ‘अबे शादी कर ले’. पछतावा हो रहा था कि कम से कम उसका मोबाइल नंबर ही ले लेता. अगर नंबर होता तो उससे फिर मिलने की उम्मीद तो रहती। कमल से स्टेशन पर मिले दो साल से ऊपर हो चुके हैं पर आज भी सड़कों पर ऑटो वालों में उसका चेहरा ढूँढने की कोशिश करता हूँ. हमेशा सोचता हूँ कि अगर किसी दिन वो मिल जाये और उससे अपने दिल की बात कह लूं तो शायद दिल का बोझ कुछ हल्का हो जाये